Description
प्रस्तुत श्री बृजमोहन वचनामृत के श्रृंखला (Series) के आध्यात्मिक साहित्य उपर्युक्त्त अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन व सामग्री है। इसमे समुचित साहित्यिक व आध्यात्मिक परिभाषाओं व सूत्रों, अभ्यास अनुभवो व अनुभूतियों का अनुपम अनुकरणीय सहज व सरल विधि व विद्या का विश्लेषणात्मक विवरण है जो दिन प्रतिदिन के आध्यात्मिक साधनाओं व अभ्यासो के कठिनाइयों व समस्याओ के निराकरण करने में राम बाण की तरह प्रभावशाली सिद्ध होता है। ऐसा असंख्य साधको व श्रद्धालुओ के अनेकानेक अनुभवों में प्रदर्शित व परिलक्षित हुआ है और होता रहता है। ऐसा सभी के अनुभवो को जानकर यह स्वयमेव सिद्ध होता है कि ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि यह बीसवी शताब्दी के महान सन्त – परम सन्त महात्मा श्री वृजमोहन लाल जी महाराज की ओजस्वी दिव्य तेजोमय वाणी व परम सन्त महात्मा श्री यशपाल जी महाराज (संस्थापक अखिल भारतीय संतमत सत्संग (रजि०) दिल्ली) द्वारा अपने अनुभव सिद्ध प्रसंगों सहित परमात्मा की गहरी याद व ध्यान में रचित की गई आध्यात्मिक ग्रन्थ है। इसमे आध्यात्मिक जीवन के आवश्यक सभी पहलुओं को सरलता से समझाते हुए ‘जीवन मुक्त अवस्था’ प्राप्त करने के लिए बहुत सरल भाषा व भावों में प्रस्तुत किया गया है। आधुनिक युग की वर्तमान स्थितियों व विषम परिस्थितियों के चलते आध्यात्मिक साधना हेतु “श्री बृजमोहन वचनामृत” को व्यवहारिक श्रीमद् भगवद्गीता “गीता” (Practical Shrimad Bhagwat Geeta) कहना सर्वथा उचित होगा। इससे साधकों को स्फूर्ति मिलती है, मन में अटकाव – भटकाव व चंचलता का अनुमान होता है और आध्यात्मिक साधना में कई अवसरों पर बहुत बड़े सम्बल का काम करता है। वर्तमान के पथ प्रदर्शक व संरक्षक ‘अष्टांग योग गुरु परम संत महात्मा डॉ सुरेश जी महाराज’ देश-विदेश में आध्यात्मिक शिविरों और अनंगपुर आश्रम में आनंद योग विद्या का सरल स्पष्टीकरण (simple explanation) व अभ्यास (Practical) जिज्ञासु साधकों के लाभार्थ कराया करते हैं।
अनन्तपारं किल शब्दशास्त्र, स्वल्पं तथायुर्बहवश्च विघ्नाः
सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु, हंसैर्यथा क्षीरमिवाम्बु-मध्यात्
-पंचतंत्र-
अर्थात् आध्यात्मिक ग्रन्थों में अथाह आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान के पठनीय साहित्य असीम है, आयु थोडी है और अनेक प्रकार के विघ्न आ जाते है, इस लिए सारे साहित्यो को छोड़ कर सार-रूप शास्त्र को ग्रहण करना चाहिए, जिस प्रकार हंस पानी में से दूध का अंश ग्रहण कर लेता है।
The literatures are voluminous and Boundless but our age is very Short and also full of many obstacles in it. So we should adopt only extracts and overlook things, like the swan who drinks milk out of the mixture of water and milk. “Further it is also said that information and knowledge are useful to the extent one can instils the particular knowledge/ information which are useful to oneself, otherwise it is nothing but nothing but mere decoration of mind”.
In view of the above statement the volumes of Shri Brijmohan Vachanamrit is quite appropriate and befitting to accomplish the One’s greatest achievement of life i.e. Spirituality.
प्रस्तुत आध्यात्मिक ग्रंथ “श्री बृजमोहन वचनामृत” के भाग 1 का अवलोकन कर स्वयमेव अनुभव व अनुमान करे व कराये। कहा गया है कि-
An ounce of experience is equivalent of tons of perceptions.
“परमात्मा तू ही है तेरी इच्छा पूरी हो”




